थम गया समय
कहानियों की छाँव में,
ज़िन्दगी जो तेज़ थी चल रही
कुछ रुक सी गयी।
अल्फ़ाज़ कुछ अलग से
इन होंठों को छूकर,
फिर याद बन गए
मेरी किताब के।
कहता रहा मैं
कि और थोड़ा देख ले,
ज़माने की फ़रमाइशों के
इस उमड़ते सैलाब को।
एक अरसा सा लगता है
तेरे साथ ए ज़िन्दगी,
बैठकर फिर एक बार
वह पिटारा सा खोले।
समझाया था बहुत
पर सहलाता रहा मैं,
रास्ते की धूल को
बादलों का गुलिस्तान समझ के।
आँधियों की रफ्तार
तेज़ तो बहुत थी,
रुकने का बहाना
कभी मिला ही नहीं कोई।
हार और जीत के मायने
मेरी समझ के हैं परे,
मेरे पिटारे में कुछ और हैं कहानियाँ,
सुनाता ज़रूर पर अभी चलना है मुझे।

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