कहते सुना था हमने उन्हें
भारत एक ख्व़ाब है,
ना धर्म इसका कोई
ना ही कोई जात है।

इस ख्व़ाब को जो देख ले,
मन भी उसका साफ है।
तेरे मेरे से कहीं परे
यह सबका पहला जज्बात है।

ख्वाब की तरह
पूरा करने की एक चाह लिये,
जो मानता इसको वतन
ना हिन्दू ना मुसलमान है।

तेरा और मेरा सोचना,
और सोच को फिर थोपना।
लगता नहीं कुछ है भला
जो देखता वह रो रहा।

क्या ये मिट्टी लाये तुम,
इसपर सबका अधिकार है।
जो सींच रहा इस नफ़रत को
वह बैठा यहीं इस पार है।

यह ख्व़ाब तेरा मेरा नहीं,
यह सबकी जायदाद है।
जो देखते थे कभी इसे
वह रो रहे फिर आज हैं।

रहने दो यह झूठी भक्ति,
तुम्हारी कुछ और ही प्यास है।
ना मतलब धर्म से तुमको
ना इंसानियत का एहसास है।

उठ रही आवाजें फिर से,
यह अंत नहीं आगाज़ है।
दिल से पूछा मैंने तो बोला
भारत अभी भी एक ख्व़ाब है।

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