गुज़रते एहसास

A father's bond with his son.

थामे हुए हाथ
था चलना सिखाया,
लम्बी रातों को
सीने से लगाया।

डग-मग से चलते
कदमों को सहलाया,
कंधों पे जो अपने
था अक्सर बिठाया।

दूर कभी पास
आँखों में बसाया,
नन्ही सी इन उँगलियों से
हर साल केक भी कटवाया।

जीवन के उतार-चढ़ाव
और बचकाने मेरे सवाल,
कभी हँस कर तो कभी
गीतों में समझाया।

पत्थर दिल सा बनकर
ज़माने से लड़ना,
अपनी बातों की गहराई
और फिर उनमें उतरना,

सिखाया था आपने ही
अब शर्मा रहा हूँ,
यह बतलाते हुए
मैं घबरा रहा हूँ।

बड़ा, कुछ महसूस खुद को
आज मैं कर रहा हूँ,
उम्रभर का सार
बयान जो कर रहा हूँ।

यह कहना ज़रूरी तो
लगता नहीं है,
पर मन की यह हलचल भी
कुछ तो नयी है।

समय का यह पहिया
रुकता नहीं है,
जो किया आपने
सब कुछ दिखता नहीं है।

सारा जीवन तपस्या
है की आपने जो,
अब बारी है मेरी
इस डोर को मुझको संभालने दो।

थोड़ा ठहरो अब
कुछ मंद-मंद मुस्कुराओ
कुछ हमारी सुनों
और सब अपनी सुनाओं।

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I am a nomad at heart who craves for journeys and experiences. Life is too short to stop exploring and the quest to be happy should go on.

8 thoughts on “गुज़रते एहसास

  1. Loved the flow of emotions and the way of expressing the gratitude.
    ‘बड़ा, कुछ महसूस खुद को
    आज मैं कर रहा हूँ,
    उम्रभर का सार
    बयान जो कर रहा हूँ।’, these lines say it all!

I would love to hear from you :)

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