लम्हे

शब्दों का ताना बाना
बुन ही लिया फिर
एक कदम और चल के देखा
तो तुम साथ ही खड़े थे।

इन गहराइयों को नापना
आता ना था हमको,
अरसा जो बीता
बिखरे कुछ टुकड़े पड़े थे।

उन टुकड़ों के साये
कुछ मन में बुदबुदाये,
जो कहना था हमको
और ना फिर कभी कह ही पाये।

जाता रहा वक्त
आँचल समेंटें
वह बादल की चादर
जब मोर छम-छमाये।

हमने मुड़कर जो देखा
कुछ शब्दों का उलट फेर,
ना तुमको जमा
और ना हम ही समझ पाये।

अरे जाने भी दो फिर
क्यों आज रोकें,
मुसाफ़िर थे कुछ ख्व़ाब
जिनके हम थे सताये।

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I am a nomad at heart who craves for journeys and experiences. Life is too short to stop exploring and the quest to be happy should go on.

7 thoughts on “लम्हे

  1. “Kuch shabdo ka ulat fer na tumko jama na hum hi samjh paye”….So deep line beautifully penned!!!👏👏

    1. It feels so amazing and content to hear such words. I am glad my readers feel connected to my words 🙂 . Thanks for the support buddy.

  2. Khwab to khwab hote hain
    Kuch piche rah jaate hain
    To kuch saath chalte hain
    Afsosh kyun karun uska
    Jo piche chut gaya
    Haath pakad saath chal rahe khwab ka
    Main to ek nayi manzil ki aur nikal pada

I would love to hear from you :)

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