शब्दों का ताना बाना
बुन ही लिया फिर
एक कदम और चल के देखा
तो तुम साथ ही खड़े थे।

इन गहराइयों को नापना
आता ना था हमको,
अरसा जो बीता
बिखरे कुछ टुकड़े पड़े थे।

उन टुकड़ों के साये
कुछ मन में बुदबुदाये,
जो कहना था हमको
और ना फिर कभी कह ही पाये।

जाता रहा वक्त
आँचल समेंटें
वह बादल की चादर
जब मोर छम-छमाये।

हमने मुड़कर जो देखा
कुछ शब्दों का उलट फेर,
ना तुमको जमा
और ना हम ही समझ पाये।

अरे जाने भी दो फिर
क्यों आज रोकें,
मुसाफ़िर थे कुछ ख्व़ाब
जिनके हम थे सताये।

You cannot copy content of this page
%d bloggers like this: