जिन्दा हूँ मैं

सवालों के जवाब
और जवाबों में हिसाब
ढूँढता ही रहा मैं
देर लगी तो
सहमें से पत्तों की तरह
झूमता ही रहा मैं
कुछ मन का किया
कुछ कडवाहट इन रिश्तों में
महसूस भी की है
रास्ते की चमक
और कुछ पाने की ललक
विरासत में मिली है
एहसान के आगोश में
लिपटा हुआ एक अपाहिज सा परिंदा हूँ मैं
लाशों की बस्ती का राजदार सा कोई
अपरिचित बाशिंदा हूँ मैं
नजर जिस सीध में
जाती है हरसूं मेरी
वहीं मेरा सवेरा भी है
सवाल कुछ मुट्ठी में लिये
लाशों के बीच बैठा जरूर हूँ
जवाबों की मौत का प्रत्यक्ष
पर अभी जिन्दा हूँ मैं

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I am a nomad at heart who craves for journeys and experiences. Life is too short to stop exploring and the quest to be happy should go on.

15 thoughts on “जिन्दा हूँ मैं

  1. Jawabon ki maut kyu?? Yahin meri sui atak gayi hai.
    Beautiful rhyme. Loved raaste ki chamak kuch paane ki lalak viraasat mein mili hai mujhe!

    1. Jawabon ki maut isliye kyunki har taraf sawal hi hain baas. Jawab kisi ko nahi chahiye, “jo jaisa hai theek hai” ki aadat ho gayi hai.

      1. True that. Mujhe toh lagta hai koi sawaal bhi nahi poochna chahta from fear of ghosts in your own backyard. Well composed!

I would love to hear from you :)

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