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सुकून ढूँढने चला जो
तो रास्ते नें भी मुँह फेर लिया,
रास्ता जो लगता था हमसफ़र
थोड़ा और लम्बा हो चला।

अंजाने थे हम
बेखबर इस मातम से,
जो बैठे दो पल कहीं
मिट्टी भी वहीं गीली थीं।

बादलों के साये में
सोया ज़रूर हूँ,
पर प्यास तो मैंने
आँसुओं से ही है बुझाई।

खोया जो अकसर
वह मेरा नहीं था,
जिसको पाकर खोया
कीमत उसकी लग ना पाई।

बहुत दिया है उसने
और कुछ मैं ढूँढ ही लेता हूँ,
हँसने के बहाने ही अच्छे
जो मुफ्त ही मिल जाते हैं।

ख्व़ाब देखे
अरसा हो चला है अब,
भूल सा गया हूँ
बेसुध कैसे सोते हैं।

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